हमने एक दुनिया बनाई।
उसे अपने भीतर पाला, अपनी हथेलियों से सींचा, रोज़ थोड़ा-सा ख़ुद उसमें मिलाया। मोहब्बत की खाद डाली, इंतज़ार का पानी दिया और देखते-देखते एक बंजर ज़मीन पर हमारा गुलशन उग आया। मीलों तक फैला हुआ। किसी जादू से निकला हुआ कोई अजूबा।
हमने उसमें फूल लगाए, कुछ काँटेदार, कुछ चमकीले, कुछ ख़ुशबू में डूबे हुए, कुछ रंगों से मदहोश और कुछ ऐसे जिनके बारे में हमने पहले कभी सोचा भी नहीं था। हर सुबह उसे मोहब्बत की रौशनी से नहलाया। तिश्नगी के बीज डाले। सूखी पत्तियों की छँटाई की। ख़राब मौसमों को बर्दाश्त किया। धीरे-धीरे एक मुकम्मल कायदा-ए-बागबानी ज़िंदगी बन गई।
हमने रेत पर रास्ते खींचे। रेगिस्तान के सीने में पानी के फ़व्वारे रखे। दूर दूर तक फूल उगाए। मुलाक़ातों की क्यारियाँ बनाते गए, इंतज़ार की मिट्टी पलटते गए और बाग-ए-गुलशन, बढ़ता गया।
फिर एक दिन पन्नों के बीच एक गुमसुम-सा फूल रख देने का दिल हुआ। बगीचे की तरफ़ दौड़े। सबसे ख़ूबसूरत फूल चुना। एक ऐसा फूल जिसे किसी किताब के बीच दबाकर रखा जा सके, ताकि लौटकर कभी उसे खोला जाए तो उसकी ख़ुशबू से पूरी दुनिया फिर से आबाद हो…
मगर कोई फूल नहीं टूटा।
कोई शाख़ नहीं झुकी। कोई पत्ती नहीं हिली। बगीचे ने कोई जवाब नहीं दिया।
बंजर में खिला वह फूल किताब के पन्नों तक आते-आते कहीं ग़ायब हो गया।
हमने किताब बंद की। आँखें खोलीं। और सबसे पहले अपने गुलशन का भ्रम तोड़ा।
एक तवील जुमला पढ़ा और हम सराब की तलाश में निकल पड़े।
दिशा 🌻
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