क्यों लिखती हो इतना?
मेरे पास बैठो, बातें करो।
थोड़ा वक़्त बाटो,झगड़े करो।
क्या लेखनी ही तुम्हारा दुनिया की रीतियों से पलायन है?
क्या मेरी बाँहें वो सुकून नहीं दे सकतीं?
क्या ये टाइपराइटर कि आवाज़ मेरे स्पर्श से ज़्यादा दिलचस्प है?
मैं थक कर घर किसके लिये आयूं?
मैं किसके आँचल में मुँह छुपाऊँ?
सुनो ना, अब चाय में चीनी ज़्यादा करके क्यों नहीं बनाती?
नाराज़ हो? साड़ी तोहफ़े में लोगी?
सुनो गज़रे वाले को क्या बोलूँ?
दिन में दो दफ़ा गजरा बदलने वाली तुम, बाल खोल के ३ दिन से टाइपराइटर के आगे हाथ क्यों घुमा रही हो?
रोज़ धुली हुई साड़ी का आँचल मैला क्यों रखा है?
चाय के कप के गोल निशान हर तरफ़,हर तरफ़ क्यों है, रजनी?
आखों के कोने में आंसू की ये एक धारा,२ दिन से नीचे क्यों नहीं गिरी?
मुझसे व्यथा का कारण तो बाटों?
बाहर आये बच्चों के साथ नहीं खेलोगी?
तुम मेरे बटुए में छुट्टे पैसे नहीं टटोलोगी?
मुझे तुम्हारी चिंता क्यों है?
मैं दुनिया की नज़रों में तुम्हारा प्रेमी तो नहीं?
मैं तुम्हारा हमसफ़र तो नहीं?
मैं तुम्हारी कला का शागिर्द हूँ।
मैं तुम्हारी साड़ी के पल्लो का किनारा हूँ।
तुम सूर्या हो,तुम्हारी रोशिनी में चमकता मैं सितारा हूँ।
दिशा🌻
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