
मुझको कलम पकड़ना सिखाते वक्त,
तुम्हारी कलम भी तो छूट रही थी, माँ।
तुम्हारी कोख ने एक कल्पना रची,
तुम्हें पता था,
दुनिया उस कल्पना का बोझ नहीं झेल पाएगी।
फिर तुमने काया रची,
और काया को ही दुनिया बना दिया।
तुमने आँखें दीं, कान दिए, भौंहें दीं, मस्तक दिया,
तुमने कल्पना को देह की शीशी में महफ़ूज़ कर,
दुनिया में भेज दिया।
दुनिया तुम्हारी कोख-सी सुंदर नहीं थी, माँ,
पर तुम्हारे नरम हाथ थे,
उन हाथों के नीचे
हर दुनिया सुंदर लगती थी।
तुमने मासूम अपनी किताब-ए-ज़िंदगी बंद कर,
मेरी तक़दीर को सुर्ख़ लिखा।
मेरी किताबों को संजोते-संजोते,
तुम्हारे हाथों ने काली स्याही की चादर ओढ़ ली,
और मुझे
तारों से बातें करने की औक़ात दे दी।
मैंने कई आसमान देखे,
प्रेत-परियों की कहानियाँ सुनीं, सुनाईं,
अंतरिक्ष देखा, संविधान देखा,
ख़्वाबों का मरकब मकान देखा।
पर जब भी देह को कल्पना पुकारती है,
तुम्हारी कोख याद आती है।
मैं फिर वही जंतु बन जाना चाहता हूँ,
जो सैकड़ों नलियों से,
तुम्हारी कोख में पनप रहा था।
वही मेरी असली दुनिया है।
मुझे अपनी कोख में छुपा लो, माँ।
तुम जो खाओ, वही खिलाओ,
तुम जो पियो, वही पिलाओ।
देह को ओढ़े आई यह आज़ादी,
मेरी कल्पना के कंधे
संभाल नहीं पा रहे।
मेरा काल्पनिक "मैं"
आज भी तुम्हारी कोख में ही साँस लेता है, माँ!
दिशा 🌻
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