बेपरवाह

बहुत अपने से बहुत पराए तुम
नरम थे सख्त थे
तुम रात की वो आवारा हवा थे
बालों पे पड़ती वो अल्हड़ आज़ादी तुम
ख़ाली सड़क पे पीछे भागते वो पेड़ वो लोग
वो व्यस्थ रातों की ख़ाली अधूरी नींद थे
समय के घरौंदों से कोसों दूर
तुम्हारा घर था
तुम्हें वहाँ अकेले रहना पसंद नहीं था
पागल आवारा नादान
चंचल चितवन बेपरवाह
तुम थे।
हर बात पे हँसते थे
हर बात पे यूँ ही कुछ भी
बेहद छोटी सी बात पे रूठ जाते थे
तुम बहुत सुंदर थे
इतने ज़िम्मेदार
उससे थोड़ा सा ही ज़्यादा लापरवाह
तुम्हारी हर अदा के पीछे एक राज था
मेरी कल्पना को जैसे किसी ने
आकाश से बुला धरती पे सजाया था।
दिशा 🌻

Comments

Leave a Reply