ख़ुद को खोजने की इस मुठभेड़ में
मैं नंगे पाओं घर से निकल आया।
इधर भागा उधर दौड़ा
बिजली के तारों सी उलझी गलियाँ
गिरते पड़ते चोटिल उठते बैठते
जूतों की याद हमेशा आती रही।
लाखों कंकड़ लड़े,
कोमल तलुए छिल गए
गोरे गोरे नन्हे पैरों पे
काले धब्बे बड़े बड़े छाले से
जूतों की याद हमेशा आती रही।
सूजे पैर जब उठ ना सके
चल ना पाया जब मैं इंच भर
खड़ा ना हो पाया एक पैर पे
उचका लड़खड़ाया गिरा मुंह के बल
जूतों की याद हमेशा आती रही।
किसी ने ना पूछी कुर्सी,
पेड़ों तक ने डालियाँ समेट ली,
लहूलुहान पाओं मेरे
कतरा कतरा ढूँढते रहे धरती
जूतों की याद हमेशा आती रही।
मैं बेहोश अधमरा अब अपने पहाड़ पे खड़ा था
मेरे तलुए के मांस से हड्डियां झाँक रही थी
मैं अब उस मंज़िल की हवा में साँस ले रहा था
पैर बचें थे या नहीं अब फ़र्क़ पड़ता नहीं था
मैं ना जाने और कितने मील दौड़ सकता था
जूतों की मुझे ज़रूरत नहीं थी।
दिशा 🌻
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