उदासी हमारी पहली माँ

हम सब बेशक बेहद उदास होना चाहते हैं। गूढ़ उदास। ऊपर से चुप अंदर से खरबूजे से लाल, उदास। गंभीर उदास, चकित उदास, चंचल उदास। हम सब बहुत उदास होना चाहते हैं। सफलता के एकाकीपन के साथ मिलों फैली अकेलेपन की चादर ओढ़ने की लालसा हमारी जिजीविषा है। हम चाह कर भी ख़ुद को इससे पृथक नहीं कर सकते। हमे बनाया ही उठ कर खड़े होकर लड़ने फिर हारने, जीतने के लिए हैं। इसमें उदासी का एक अहम पन्ना है। जो अंतिम लक्ष्य है। वो लक्ष्य जो हम कभी ठीक तरह से पढ़ भी नहीं पाते। उदासी हमे पढ़ती है।
हम चाहे ना चाहे उदासी ही हमे उबारती है, उदासी ही हमे सवारती है और उदासी ही हमे आगे धक्का देती है। ज़िन्दगी की किवाड़ को खोलने और बंद करने की ज़िम्मेवारी उदासी के कंधों पे है।
हम उदासी से जन्मे जीव उदासी में ही समा जाते हैं। उदासी हमे निगल जाती है और हम उसकी कोख में फिर से एक निर्जीव वस्तु बन अपना शरण लेते हैं।
हम कभी नहीं चाहते हमारे साथ ये सब कुछ हो। हमे ख़ुशी के कपड़ों के आगे अंदर उदासी की कंकाल को अनदेखा करना सिखाया जाता है। पर नाव कब तक किनारे से दूर रह सकती है? उसका तो अंतः अस्तित्व किनारा है।
उदासी, हमारी पहली माँ है, आख़िरी शरण और वह अँधेरा, जिसमें जाकर हम पहली बार अपने होने की आवाज़ सुन पाते हैं।
दिशा 🌻

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