महफ़िल में जब भी बात तेरे आँखों की हुई,
मैं चुप रही ।
चुप रही मैं,
तेरी आँखों का ज़िक्र जब जब हुआ।
भूरे रंग को कला बताया गया।
मद्धम होती पुतलियों की गहराई भी
कुछ फीट कम बतायी गई।
पर मैं चुप रही।
चुप रही हर उस बैठक में
जहाँ जहाँ तेरी पलकें कुछ कम गिनायीं गईं।
तेरी नज़रों पे जहाँ किए गए
अनेकों प्रश्न उत्तर।
कमी है, हाँ कुछ तो कमी है,
इन नैन नक्शों के भीतर।
पर मैं चुप रही।
पर जब बोला गया कि तू आँखों से नहीं बोलता,
मैं ख़ुद को रोक ना पायी।
मैं बोली, मैंने सुना है।
उनका गुनगुनाना, बेवजह मुस्कुराना।
मैंने सुना है।
उनका रूठना, उनका मनाना।
मैंने सुना है।
उनकी अपील, उनका हट्ठ।
सुना है,
उनका गुस्सा, उनका प्रेम।
मैंने सुना है,
वो सब वो जो दुनिया को नहीं बताती।
मैंने सुना है,
आँखों से ही सही।
पर मैंने सुना है।
दिशा 🌻
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