दरवाज़े के बाहर

मैं तुम्हारे दरवाज़े के सामने खड़ा हूँ। दरवाज़ा खटखटाने की हर नाकाम कोशिश करता हुआ। अपनी दायीं हाथ की बीच वाली उँगली से अगर तीन बार दस्तक दूँ, तो तुम जान जाओगी, मैं हूँ। मगर तुम दरवाज़ा नहीं खोलोगी। तुम्हें मालूम है, दरवाज़े खोलना और मुझे भीतर आने देना, दो अलग-अलग अपराध हैं।

मैं निरा बेवक़ूफ़, अपनी ज़ुबान पर आते तुम्हारे नाम को थूक के साथ घोंट जाता हूँ। मैं तुम्हारा नाम लेने के लायक़ नहीं हूँ। तुम्हारे नाम की मात्राएँ भी मेरे हलक से निकलने की इजाज़त नहीं रखतीं। कभी-कभी लगता है, नाम लेना भी एक तरह का अधिकार है। और प्रेम में मैंने अधिकार खो दिए हैं, शायद उसी दिन, जिस दिन तुम्हें प्रेम करना शुरू किया था।

मैं तुम्हारी हरी जूतियों से चिपकी वह मामूली-सी धूल हूँ, जिसे तुम चलते-चलते अपने रास्ते से झाड़ देती हो।
फिर भी देखो, मेरी औक़ात का आख़िरी हिस्सा भी तुमसे चिपका हुआ है।

क्या मैं तुम्हारी लिखी कोई कविता पढ़ दूँ? नहीं। मेरी ज़ुबान से निकलते ही वह कविता नहीं रहेगी। वह मेरे होने से मलिन हो जाएगी। मैं कोई ऐसा मुजरा भी नहीं कर सकता जिसकी थरथराती आवाज़ तुम्हारे हिमालय जैसे, खरबूजे की तरह भीतर से लाल और बाहर से चुप दिल को थोड़ा-सा पिघला दे। मैंने तो अपना कितना वक़्त तुम्हारी उस लाल मख़मली चादर के इर्द-गिर्द गुज़ारा है, जैसे कोई ग़रीब आदमी मंदिर के बाहर बैठकर भीतर के भगवान की कल्पना करता है।

मुझे अपने आस-पास रख लो। मुझे कहीं कोई कोना दे दो।
कमरे का नहीं, अपनी ज़िंदगी का भी नहीं। मुझे अपनी उस नापसंद मूर्ति की तरह कमरे के किसी कोने में पनाह दे दो, जिसे तुम रोज़ देखती हो और रोज़ नज़रअंदाज़ कर देती हो।

मैं कविता नहीं कह सकता। मेरी औक़ात नहीं है। कविता तो तुम्हारी आँखें हैं। तुम्हें ज़ुबान देना ऐसा ही है जैसे कोई नदी को बहना सिखाए, या रात को अँधेरा करना। मैं कौन होता हूँ तुम्हें आवाज़ देने वाला?

मुझे समझ नहीं आता, तुम मुझे छोड़ क्यों नहीं देतीं? क्योंकि शायद छोड़ देना भी प्रेम का एक रूप है, और तुम मुझ पर वह कृपा भी नहीं करना चाहतीं। इसलिए मैं यहीं हूँ। ज़मीन पर। तुम्हारे घर के बाहर। दरवाज़े को निहारता हुआ।
न दस्तक अब बाकी है, न पुकार। बस एक आदमी है, जो तुम्हारे दरवाज़े के बाहर बैठा है और ये समझ रहा है कि शायद प्रेम की सबसे बड़ी सज़ा यही है कि तुम किसी को अपना भगवान बना दो और वह तुम्हें अपने दरवाज़े के बाहर इंसान भी न रहने दे।
दिशा 🌻

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