मैं इतना असहाय हो चुका हूँ कि अपनी बात को रोटी के साथ खा रहा हूँ। होठों को सूत से सी दिया गया है और ज़बान को काटकर खूँटी पर टाँग दिया गया है। मैं इतना बेबस हूँ कि इंसान भी मेरी हालत पर शर्मिंदा हैं।
मैं पूरा गल चुका हूँ।मेरी बाती को जला कर गला दिया गया है। मैं, अपनी बातों को सूटकेस में बंद कर, उन्हें अपने साथ लेकर कहीं दूर चला जाना चाहता हूँ। अपनी ज़बान को वहीं खूँटी पर टँगा छोड़कर, एक बेज़ुबान जानवर की तरह मीलों दूर भटकना चाहता हूँ। वहाँ पहुँचकर भी वह सूटकेस कभी नहीं खोलूँगा। कभी नहीं।
मेरी ज़बान मेरे बिना मछली जैसा छटपटाएगी, उछलेगी, तड़पेगी, बेहोश हो जाएगी, फिर एकाएक एक दिन मर जाएगी। उसके साथ ही मर जाएगा मेरा स्वीकार्यता का जुनून।
फिर मैं कहीं दूर से भी दूर जाकर बस जाऊँ और फिर कभी नहीं बोल पाऊँ । इशारों में बात करूँ। बेज़ुबान रहूँ। धीरे-धीरे सुनना और देखना भी छोड़ दूँ, दुनिया की आवाज़ें मुझ तक न पहुँचें और ना मेरी ख़ामोशी किसी तक।
अपनी कायरता को ओढ़कर हर रात तपस्या करूँ। मलिन कपड़े पहनूँ और चुपचाप सो जाऊँ। दुःख को समझने के लिए किसी चोट का मोहताज नहीं होना चाहता; बस इतना चाहता हूँ कि दुःख मेरे भीतर उतरे और वहीं अपना घर बना ले।
फिर मैं बस अपने दुख के लिए जिऊँ। अपने ख़ुद के लिए रोऊँ और अपने आँसू सींचू। फिर मैं अपने ही आँसुओं के लिए दिन काटूँ।
बेज़ुबान।
दिशा 🌻
Leave a Reply