अहम् की प्राप्ति में,
सत्तर प्रतिशत खर्च हो चुका हूँ।
अब पूरा का पूरा समुंदर बनाने,
और एक बूँद समान उसमे,
अपनी हस्ती मिटा देने में
कोई अंतर नहीं बचा है।
मैं कतरा कतरा
अपनी ज़िन्दगी उजाड़ रहा हूँ
आशा के भ्रम में हूँ।
मैं निराशा की चादर ओढ़े,
शून्य में निहारता,
मुक्तिबोध का इंतज़ार कर रहा हूँ।
बचे तीस प्रतिशत अहम् को
मैंने बचा के रखा है।
तुम्हारे इंतज़ार में
पथरायी आँखों के त्रिभुज पर
मेरा एक कतरा आँसू
अभी भी झुर्रियों की सीढ़ियाँ
नहीं उतर रहा है।
जिस दिन तुम्हारे होने का कच्चा
सपना टूट के मेरी
सबसे सुंदर मोती वाली माला की तरह
हम दोनों के हाथ से सजाए
हमारे बगीचे के बीच
टूट के पूरी तरह बिखर जाएगा
अहम् पूरा खर्च हो जाएगा ।
दिशा 🌻
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