
कभी ध्यान से बैठ कर
दो पल सोच लूँ
तो लगता है कितना ग़लत कर रही हूँ
हर काम हर समस्या का हल
जैसे कोई नितांत हल हो ही ना
कोई भी समाधान होता ही ना हो
कोई निस्तारण कोई सुलहनामा
बना होता ही ना हो
जैसे मैं रच रही हूँ नयी पहेली
हर इक समाधान में
एक चक्रव्यूह में
ना चाहते हुए
बस एक हिस्सा एक बड़ा भाग
मेरे खाते में कुछ समस्याएँ
जिनकी मैं ख़ुद हूँ
अंत और शुरुआत!
दिशा🌻
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