Category: ख़ुद की चढ़ाई🤍
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मेरी डायरी में इस वक्त इतनी अधूरी कविताएँ हैं, इतने अधूरे लेख हैं, कि मैं अधूरे लेखों पे लिख रही हूँ । बहुत कमाल के लोग होते हैं जो सब अंत तक पहुँचाने का जोश और एकाग्रता रखते हैं। मुझ जैसे विचलित लेखक से रोज़ रात बिस्तर में कलम ख़ुद दो दफ़े पूछती है,…
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दो पल ख़ाली, बैठा खुदी संग, लोक परलोक, गूढ़ रहस्य मलंग। राज़ छिपे भीतर, रामरावण संगसंग, दुष्यंत द्रौपदी शकुनि, जीवन मध्यांतर अनंत। ख़ुद ही द्रोणाचार्य, ख़ुद ही एकलव्, खुदी गांधी बने, खुदी जिन्नाह बाबत। गोलियाँ चलीं भीतर, खिले कमल कीचड़, प्रेम क्रोध द्वेष, मानुष हीनता विवश। नासमझी नाबुझी, उठ बैठ खड़े, खुदी सबसे वीभत्स, सिर…
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कभी ध्यान से बैठ कर दो पल सोच लूँ तो लगता है कितना ग़लत कर रही हूँ हर काम हर समस्या का हल जैसे कोई नितांत हल हो ही ना कोई भी समाधान होता ही ना हो कोई निस्तारण कोई सुलहनामा बना होता ही ना हो जैसे मैं रच रही हूँ नयी पहेली हर इक…
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दुख महंगा बिकता है, हम सस्ते तौले जाते हैं। मेरी दुविधा मेहंगी बिकती है, उपाय सस्ते तौले जाते हैं। अधूरा प्रेम बहूमूल्य बिकता है, मुकम्मल इश्क़ सस्ता तौला जाता है। आवाज़ मेहंगी बिकती है, विचार सस्ते तौले जाते हैं। फ़ासले महँगे बिकते हैं, नज़दीकियाँ सस्ती तौली जाती हैं। रास्ते महँगे बिकते हैं, घर सस्ते तौले…