वो चार सफ़ेद बाल

दुनिया की नापाक हसरत होगी

तुम्हारी वो लट

शायरियाँ लिखी जाती होंगी

तुम्हारे सुरमे पे

लोग रंग शोध करते होंगे

गुलाबी होठों पे

ब्रह्मांड गूँथ समेटा होगा

काली छोटी बिंदी ने

रोज़ थोड़ा बहक़ जाता होगा कोई

उस झुमके की चाल पे पर

पार इन्हें इक शृंगार है सजनी

दिखा छिपा रही हो तुम

शक भरी निगाहों से बचता तुम्हारी

डरा सहमा सा साज वो

पारलौकिक अलौकिक दृश्य अदृश्य

सजनी तुम्हारे हर शृंगार से सुंदर

है तुम्हारे वो चार सफ़ेद बाल।

बाल जो सुनाते हैं

तुम्हारे संगर्ष की दास्तान

जो करते हैं तुम्हारी

नाकामियों को बयान

जो गूँथे बैठे हैं तुम्हारे

गिर के उठने की कहानी

जो पढ़ते हैं

25 की उमर में 35

के तजुर्बे की निशानी

सफ़ेद बाल जो जोड़ते

हैं तुम्हारे कटीले नैन नक़्श

में चार चाँद

ना जाने क्यों छिपा रखा है

उन्हें समझ बेजान।

बीच माँग काढ़े जब

झांकते हैं वो काले बादलों से

बखूबी मेरी नज़रों में

और बड़ी हो जाती हो तुम वैसे।

जीती जागती कविता वो

सुनहरे बेदागी चंचल नादान

लहराओ जैसे लहराती

पहन आसमान।

दिशा🤍