
वीभत्स खुदी
दो पल ख़ाली
बैठा खुदी संग
लोक परलोक
गूढ़ रहस्य मलंग।
राज़ छिपे भीतर
रामरावण संगसंग
दुष्यंत द्रौपदी शकुनि
जीवन मध्यांतर अनंत।
ख़ुद ही द्रोणाचार्य
ख़ुद ही एकलव्
खुदी गांधी बने
खुदी जिन्नाह बाबत।
गोलियाँ चलीं भीतर
खिले कमल कीचड़
प्रेम क्रोध द्वेष
मानुष हीनता विवश।
नासमझी नाबुझी
उठ बैठ खड़े
खुदी सबसे वीभत्स
सिर पैर पड़े।
दिशा🌻