नदी

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नदी

कब मैंने अपनी परेशानियाँ बताने से अपनों की सारी परेशानियाँ सुनने का लंबा सा सफ़र तय कर लिया, मुझे पता नहीं चला।मैं अब अपनों की सभी समस्याएँ बहुत ध्यान से सुनती हूँ। उनके हल मुझे कभी पता नहीं होते। हाँ कोई खतौनी,खसरा के नंबर का ज़िक्र होता तो दिल के साथ दिमाग़ भी अवश्य चलने लगता है पर हल संभवतः मैं दे नहीं पाती। ना जाने कब मैं सवाल पूछने से मुश्किलें हल करने की स्तिथि में आ धमकी मुझे हवा नहीं लगी। एक चेतावनी की घंटी हमे 24-25 की उमर में बड़े से मैदान में बुला के १० दिन की साप्ताहिक ट्रेनिंग के साथ समाज को ज़रूर देनी चाहिए। ऐसा नहीं है कि अब लोगों को मेरी परेशानियाँ जाननी नहीं है, सिर्फ़ वजहें बदल गई हैं।लोगों को लगता है अब वो मेरी दिक़्क़तों को दुरुस्त नहीं कर सकते। समाज की नज़रों में हम बोहोत बड़े हो चुके हैं। शायद लोगों की सामाजिक समझ के हिसाब से हमारी समस्याएँ उनकी इलाज की औक़ात से परे है । पिताजी जी कभी चिंता से हाल चाल पूछते तो हैं, पर सिर्फ़ सकारात्मक जवाब की उम्मीद से। किसी को उम्मीद के परे एक नकारात्मक जवाब देने से मुझे डर लगने लगा है। अपनी नहीं उसकी सेहत के लिए। अपनी सच्चाई हम दूसरों के फ़ायदे के लिए छुपा रहे हैं।एक सुंदर झूठ गढ़ के जीना अब ज़रूरत से ज़्यादा मजबूरी है। कोई अब कभी गलती से मुझसे पूछ भी दे कि कैसी हो? मेरी चेतना से मैं उससे यही जवाब देना चाहूँगी की पता नहीं। मुझे पता ही नहीं है अच्छा और बुरा होते कैसे हैं। मेरा अच्छा होना तुम्हारे अच्छा होने से कितना भिन्न है, मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ! हमारे ठीक होने के मायने कितने व्यक्तिगत हैं, उमर के इस पड़ाओ पे समझ आता है। “ठीक हूँ” से सुंदर और सुरक्षित पंक्ति मैंने नहीं सुनी। कितनी बार इसने मुझे दुनिया की नज़रों में दिवालिया घोषित होने से बचाया है। सबसे सरल उपाय अब शांति से दूसरों की समस्याएँ सुनना और सांत्वना देना लगने लगा है।

दिशा🌻