
आगे क्या करना है?
बैठक लगी थी।
माँ ने गरमा गरम चाय बनाई थी। पिताजी अख़बार का इज़राइल फ़िलिस्तीन विवाद का विश्लेषण तीसरी बार पढ़ रहे थे।
बहन ने भी किताबें कुछ वक़्त के लिए बंद कर मोबाइल की गोद में शरण ली थी।
भाई का होना ना होना बराबर था। वो पब जी का शिकार था।
अचानक से पकौड़ों की तीखी चटपटी ख़ुशबू ने दरवाज़े पे दस्तक दी। पकौड़ों के आने से लगा जैसे वक़्त ने किया कुछ हसीन सितम।
सबने अपने काम रोक दिए। अब सबका एक ही मक़सद था, कैसे ज़्यादा से ज़्यादा पकौड़े उन्हें मिलें। पकौड़ों ने जैसे एक नया समा बांध दिया था। सभी एकाग्रता का समक्ष प्रमाण दे रहे थे।
किसी को कोई सुध नहीं थी की पकौड़े सिर्फ़ फेविकोल हैं, चिपकना हम लोगों को है।
तभी माँ ने प्रतिस्पर्धा की चुप्पी को तोड़ते हुए, इक बेहद संगीन विषय छेड़ा।
मुझे हवा में कुछ नरमी सी लगी, सामने रखे झूले के वायु के वेग से हिलने की आवाज़ मुझे थोड़ी और साफ़ सुनायी देने लगी।
मुझे महसूस हुआ कि अचानक से सबको मेरी ज़िंदगी में बहुत दिलचस्पी सी होने लगी थी। माँ ने मुझसे ज़िंदगी का सबसे कठिन सवाल,”बेटा आगे का क्या सोचा है?”जो किया था।
पिताजी का गाजा पट्टी से मेरी तरफ़ का सहसा रुख़ मुझमें बहुत असहजता उत्पन्न कर रहा था।
बहन तक की नज़र फ़ोन से एकाएक ऊपर उठी थी। भाई, ख़ैर अब भी उसका होना ना होना एक बराबर था।
मैंने प्लेट की तरफ़ देखा।अभी प्लेट पकौड़ों से खचाखच भरी थी।
मुझे जवाब देने की जल्दी नहीं थी। जवाब था ही नहीं।
और ऊपर से सोचने में वक़्त ज़ाया करने से पकौड़ों का भारी नुक़सान झेलना पड़ सकता था।
और ये कैसा प्रश्न था? कौन से आगे का ज़िक्र बैठक में हो रहा था? अभी अगले पल वाला आगे,कल वाला आगे, कल से कल वाला आगे या आज से 10 साल बाद आने वाला आगे। पता नहीं।
मैंने कभी आगे का नहीं सोचा था। यहाँ तक आने तक का नहीं सोचा था। मैंने अभी का भी नहीं ही सोचा था। हाँ, मेरे कुछ दोस्त हमेशा से थे जिन्होंने अपने बच्चों के नाम, स्कूल और सुकन्या समृद्धि योजना का डिपोजिट प्लान सोच के रखा था।
पर मैं, मुझे स्कूल के डिबेट से फ़ुरसत नहीं थी। और उसने भी मैंने कोई प्लान नहीं बनाया था।
वो भाया था तो उस वक़्त वो छाया था। मुझे डर था कहीं बात आगे ना बढ़ जाए और माँ अपनी पहेली का ख़ुद उत्तर ना देने लग जायें।
उनका आगे मेरे आगे के आगे के आगे के आगे भी नहीं था। मेरा आगे कहाँ कल एक लेख लिखने को सोच रही सा लापरवाह और अल्हड़ और माँ का आगे कहाँ ज़िंदगी और मौत जैसे गंभीर मुद्दे उठाता हुआ। मेरा आगे माँ के आगे का बच्चा है, मेरे ही जैसा।
पिताजी का भी एक आगे है वो एस आई पी और म्यूच्यूअल फण्ड में निवेश अपनी सावधानी से करें वाला जिससे मुझे काफ़ी डर लगता है।इस आगे में रुपया,पैसा और बेवक़ूफ़ी संलग्न जो है। बहन का भी एक आगे है। उसको मुझे घर से जल्दी भगाना है जिससे कमरे पे क़ब्ज़ा आसानी से हो सके।
भाई, ख़ैर उसका अब भी होना ना होना बराबर ही है। इतने सारे आगे से मैं काफ़ी पीछे थी। मेरा आगे सामने प्लेट में था।
पर माँ को एक छिछला जवाब देना थानोस की चुटकी से कम ख़तरनाक नहीं था।
इसलिए मैंने दिमाग़ के घोड़े दौड़ायें और अपनी चेतना को समेटा।
ऐसे मौसम में जब ठंड दस्तक देने को तैयार बैठी थी, आम के पेड़ अब ज़िम्मेदारी मात्र लगने लगे थे और मेरी पूरी आस्तीन वाली क़मीज़ बक्से से निकल चुकी थी, पकौड़े और चाय की मदहोशी सामने पड़ी थी , माँ ने ऐसा निर्मम सवाल मुझसे क्यों किया?
मैंने आगे 30 सेकंड तक सोचा। और एक सोचा समझा मँझा सा जवाब दिया।
माँ आगे शाम का खाना है ना। मैं बना दूँगी। बहुत दिनों से एक रेसीपीए क़ोशिश करने को सोच रही हूँ।
ठंड में आपके पैर थोड़ा ज़्यादा दर्द भी होते हैं। मेरी आज छुट्टी भी है कार्यालय की। आप दिन भर काम करती हैं, आज शाम आपको आराम।
इतना सुनते ही माँ की आँखों में लाड़, प्यार, गर्व के आँसू थे, बहन के हाथ में अनकहा, अनसुना और अनंत सोशल मीडिया, पापा के हाथ में स्पोर्ट्स सेक्शन का वर्ल्ड कप की कयासें, भाई के हाथ में उसका सामने बिखरा भविष्य और मेरे हाथ में थे, क्या,
“पकौड़े।”
दिशा🌻