आखों से कश्मीर

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आँखों से कश्मीर

सुनो,क्या पढ़ रही हो?

कश्मीर के बारे में।

ये दिसंबर की सर्दी में अपने लंबे बालों को धुलने की तुम्हें सूझी भी कैसे? और यहाँ भोपाल के शोर में बगीचे में बैठ तुम अपना कश्मीर ढूँढ रही हो? तुम्हें मैं कब समझ पाऊँगा मोइना?

हाहा,कोई किसी को पूरी तरह नहीं समझ पाता किशोर!

हाहा,इतना पढ़ के इतने कम शब्दों में जवाब कैसे दे लेती हो?

कम बोलना हमेशा ज़्यादा बोलने से अधिक देता है।

अच्छा बताओ क्या पसंद है तुम्हें पहाड़ों में? कश्मीर में? तुम तो ५ साल की थी जब तुम्हारे पिता कश्मीर से भोपाल पोस्ट हुए थे।तुम्हें कुछ याद भी है?

सारी यादें धूल लगी हुई आलमारी की तरह बंद पड़ी हैं।कभी कभी सुबह की चायऔर कड़कड़ातीं सदीर्की धूप में धूल झाड़ने का मुश्किल प्रयास करती हूँ।

वो अपने आउट हाउस की पुरानी जजर्र खोटों के सहारे ज़िंदा आला जैसा?

हाँ कुछ ऐसा ही समझ लो।इक आवाज़ निरंतर उस अलमारी के कपाट को खोलने को उकसाती है।किताबों में चाभी ढूँढ रही हूँ।

तो मिली?

क्या?

चाबी! और क्या?

कई ताला साजों से मिल चुकी हूँ। शायद तलाश जारी रखनी पड़ेगी अभी।

मुझे तो ये तुम्हारी एक बात में१०० बातों वाला तर्क कभी समझ नहीं आया।फूफा जी ने ठीक कहा था अरेंज मैरिज ना कर। फँस गया अब मैं।

अच्छा।तो ये बात है। तो ये चाय लाओ और पकौड़ों को हाथ लगाने की हिम्मत मत करना।

शुक्र है। ये संभलना मुझे आता है।अब कुछ पल्ले पड़ रहा है।अरे अरे कहाँ जा रही हो?ग़ुस्से में तुम्हारा कश्मीर आँखों से टपक रहा है। रुको तो।

मेरा कश्मीर मैं संभल लूँगी।पर तुम अपना भोपाल नहीं सँभाल पाओगे। पीछे मत आओ।

दिशा🌻