
आईना
ठीक है नहीं करनी बात तो ना सही। मत पलटो मेरी तरफ़, बाल को बांधे रखो।मत लगाओ बिंदी।ना बाटो अपनी व्यथा का कारण।अकेली लैपटॉप के समक्ष बैठी शून्य में निहारती रहो।
तुम ख़ामख़ा नाराज़ हो रहे हो श्री।
ख़ामख़ा!३ दिन se तुमने मुझे ठीक से देखा नहीं है, आलिंगन तो दूर तुम जवाब देने से भी कतराती हो। हमारी शादी है १ महीने में। मैं तुम्हें समझना चाहता हूँ, जानना चाहता हूँ।तुम्हें क्या हो गया है बुलबुल?
डर। डर है मुझे। ज़िंदगी भर बांध जाने का।
दर, कैसा डर?कौन सा ख़ौफ़ है तुम्हें?
संसार में गुम हो जाने का।
बुलबुल,
किस नाम से जाने जाना चाहती हो?
जिसे पा ना सकी या जिसे पाना चाहती हो।
अपनी पहली पहचान क्या बताना चाहती हो?
आज़ादी चाहती हो?
पूर्णतः आज़ाद कोई जीवित नहीं।
कितने अनुपात में मुक्ति चाहती हो?
ख़ुद को समझना चाहती हो?
दुनिया की अनुमानित नज़र पैमाना है।
किसके लफ़्ज़ों में अहं को बयान करना चाहती हो?
क्या ढूँढ रही हो?
मिट्टी का घर या गगनचुंबी इमारतें।
क्या अपने घरौंदे पे हाथों से लेप लगाना चाहती हो?
किससे जीतने का प्रण है?
हर दिन ही एक नया मंज़र है।
दुनिया को किस अस्त्र से अपनाना चाहती हो?
ज़िंदगी का रुख़ मोड़ने से क्या होगा?
हाथ तुम्हारे ज़्यादा कुछ कभी भी कहाँ होगा।
अपने बारे गढ़े झूठ को हंस हंस के बताना चाहती हो?
डर से जीतना चाहती हो?
जो हो गया उसके अंजाम से डर या जो होना है उसके परिणाम से डर।
डर को जीवन में कितनी पनाह देना चाहती हो?
क्या सही ग़लत सत्य असत्य हो तुम?
शून्य में डूबा प्रचंड हो तुम।
प्रेम प्रबंध रीति रिवाज़ आदि अनादि से क्या परे हो तुम?
दिशा🌻