
आँचल
व्यंग पढ़ा तो दुख याद आया,
हर मज़ाक़ के पीछे का दर्द
हर ठहाके के पीछे का कृदन
हर टेढ़ी कही गई बात का
सीधा सा सरल दुख।
प्रेम पढ़ा तो दुख याद आया
हर स्पर्श के साथ की चुभन
हर स्मृति के पीछे की लालसा
हर सुध की जीवंत कामना का
सीधा सा सरल दुख।
वीर को पढ़ा तो दुख याद आया
हर विजय के साथ का त्याग
हर त्याग के पीछे की परिकथा
हर जीते जागते आघात का
सीधा सा सरल दुख|
रौद्र पढ़ा तो दुख याद आया।
हर भृकुटि की रेखा का दर्द
हर आक्रोश के पीछे की बेचैनी
हर निर्ममता को आँचल में समेटे
सीधा सा सरल दुख ।
दिशा 🌻