Category: कविताएँ

  • आँचल

    व्यंग पढ़ा तो दुख याद आया,

    हर  मज़ाक़ के पीछे का दर्द 

    हर ठहाके के पीछे का कृदन

    हर टेढ़ी कही गई बात का

    सीधा सा सरल दुख।

    प्रेम पढ़ा तो दुख याद आया

    हर स्पर्श के साथ की  चुभन 

    हर स्मृति के पीछे की लालसा 

    हर  सुध की जीवंत कामना का 

    सीधा सा सरल दुख।

    वीर को पढ़ा तो दुख याद आया

    हर विजय के साथ का त्याग 

    हर त्याग के पीछे की परिकथा 

    हर जीते जागते आघात का

    सीधा सा सरल दुख|

    रौद्र पढ़ा तो दुख याद आया।

    हर भृकुटि की रेखा का दर्द 

    हर आक्रोश के पीछे की बेचैनी 

    हर निर्माता को आँचल में समेटे 

    सीधा सा सरल दुख ।

    दिशा 🌻

  • रूठना मनाना

    इमेज क्रेडिट्स तो थे राइटफुल ओनर

    मेरी डायरी में इस वक्त इतनी अधूरी कविताएँ हैं, इतने अधूरे लेख हैं, कि मैं अधूरे लेखों पे लिख रही हूँ । बहुत कमाल के लोग होते हैं जो सब अंत तक पहुँचाने का जोश और एकाग्रता रखते हैं। 

       मुझ जैसे विचलित लेखक से रोज़ रात बिस्तर में कलम ख़ुद दो दफ़े पूछती है, कभी ख़त्म कर पाओगी? कुछ भी? कोई अधूरी लड़ाई, कोई अधूरा सीखा हुआ नृत्य, कोई पुराना याराना, कल वाली वो बात, ऑफिस के काम, अपना श्रृंगार या ये लेख? कुछ भी? 

      जवाब में मैं अपने बचे सारे होश हवास समेट कर,आधी रात को,कलम को ठेंगा दिखाते हुए जब उठती हूँ, तो मेरा रिकॉर्ड रहा है, कुछ नया अधूरा पनप ज़रूर जाता है ।आज तक कभी कुछ पूरा नहीं हुआ। कलम को खुश करने के चक्कर में डायरी अलग रूठ बातें बनाना शुरू करदेती है, मेरा कुछ तो लाज कर लो! कितने पन्ने खाली पड़े हैं? अब कुछ क्या लिखने की ज़रूरत नहीं है। पहले ये सब पूरा करो । 

    क्या पूरा करदू ? बताओ मुझे कोई? मुझे ख़ुद किसी भी शुरुआत का अंत नहीं पता । मुझे ख़ुद किसी कहानी को कैसे ख़तम करना है, नहीं पता । बिल्कुल नहीं पता । खैर मेरा डायरी कलम के साथ रूठना मनाना तो चलता ही रहता है। और बस इसी उम्मीद में कि कभी तो डायरी कलम ख़ुश होकर मुझे कोई खोया एक गुलाब ईनाम में देंगे लिखने का सतत प्रयास करती हूँ पर बदले में मिलता वोही है, एक और अधूरा लेख।

    दिशा।🌻

  • पहली पहल!

    21 बरस की उमर,
    वो पीपल का पेड़,
    मेरी पीली वाली साड़ी
    छोटी सी बिंदी!

    लाज सरम नीची पलकें
    सिकुड़े पाँव, फँसती पाजेब,
    कुछ लड़की सी अदाएं
    कुछ औरतों सी पाबंदी।

    २ कप मीठी चाय,
    ताकते झांकते परिवार,
    माँ के आँखों से,सब पूछ लेना
    1-2 सवालों में ही,के इशारे।

    ठंड में पसीने से भींगा पल्लू,
    घबरायी नज़रों से पहली बार
    मिलती २ शांत चंचल आँखें
    शोर में छाया मदहोश सन्नाटा।

    मुझे आगे पढ़ना है,
    एम ए फिलोसफी से करना है,
    बोलने में 1 घंटा लग जाना
    और आपका ये सुन मुस्कुराना!
    दिशा🤍

  • वो चार सफ़ेद बाल

    दुनिया की नापाक हसरत होगी

    तुम्हारी वो लट

    शायरियाँ लिखी जाती होंगी

    तुम्हारे सुरमे पे

    लोग रंग शोध करते होंगे

    गुलाबी होठों पे

    ब्रह्मांड गूँथ समेटा होगा

    काली छोटी बिंदी ने

    रोज़ थोड़ा बहक़ जाता होगा कोई

    उस झुमके की चाल पे पर

    पार इन्हें इक शृंगार है सजनी

    दिखा छिपा रही हो तुम

    शक भरी निगाहों से बचता तुम्हारी

    डरा सहमा सा साज वो

    पारलौकिक अलौकिक दृश्य अदृश्य

    सजनी तुम्हारे हर शृंगार से सुंदर

    है तुम्हारे वो चार सफ़ेद बाल।

    बाल जो सुनाते हैं

    तुम्हारे संगर्ष की दास्तान

    जो करते हैं तुम्हारी

    नाकामियों को बयान

    जो गूँथे बैठे हैं तुम्हारे

    गिर के उठने की कहानी

    जो पढ़ते हैं

    25 की उमर में 35

    के तजुर्बे की निशानी

    सफ़ेद बाल जो जोड़ते

    हैं तुम्हारे कटीले नैन नक़्श

    में चार चाँद

    ना जाने क्यों छिपा रखा है

    उन्हें समझ बेजान।

    बीच माँग काढ़े जब

    झांकते हैं वो काले बादलों से

    बखूबी मेरी नज़रों में

    और बड़ी हो जाती हो तुम वैसे।

    जीती जागती कविता वो

    सुनहरे बेदागी चंचल नादान

    लहराओ जैसे लहराती

    पहन आसमान।

    दिशा🤍

  • वीभत्स खुदी!

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    दो पल ख़ाली,

    बैठा खुदी संग,

    लोक परलोक,

    गूढ़ रहस्य मलंग।

    राज़ छिपे भीतर,

    रामरावण संगसंग,

    दुष्यंत द्रौपदी शकुनि,

    जीवन मध्यांतर अनंत।

    ख़ुद ही द्रोणाचार्य,

    ख़ुद ही एकलव्,

    खुदी गांधी बने,

    खुदी जिन्नाह बाबत।

    गोलियाँ चलीं भीतर,

    खिले कमल कीचड़,

    प्रेम क्रोध द्वेष,

    मानुष हीनता विवश।

    नासमझी नाबुझी,

    उठ बैठ खड़े,

    खुदी सबसे वीभत्स,

    सिर पैर पड़े।

    दिशा🌻

  • हज़ारों ख्वाहिशें ऐसी!

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    पगडंडी,पहाड़, बर्फ और झरने

    एक छोटा सा घर

    70-75 तक की उम्र

    मैं और तुम,

    छोटी छोटी बातें,

    वो तुम्हारी लंबी ठहाके वाली हंसी,

    और स्साथ में स्मिता पाटिल की

    समोसे संग लाल वाली चटनी

    वहीं पुरानी पिक्चर।

    कामयाबी,करतब,सोहरत और ब्रह्मांड

    एक बड़ा सा बंगला

    50-55 तक की उम्र

    मैं और तुम

    कभी कभार मिलना मिलाना

    वो काम के बीच कम ज़्यादा सी बातें

    और साथ में बैठ स्मिता पाटिल की

    आधी छूटी पिक्चर पूरी करने की ख़वाइश।

    दिशा🌻

  • गुमनाम

    Picture credits to the rightful owner

    आप एकाग्र कम रहती हैं ना?

    नहीं तो।आप ऐसा क्यों बोल रहे है?

    वो आज वर्ल्ड हिस्ट्री की क्लास में आप रह रह के शून्य में देखने लग रही थी ना।जैसे हिटलर को हराने की कोई नयी तरकीब सोच रही हों।

    आप मुझे कुछ ज़्यादा ही गौर से नहीं देख रहे हैं?

    बग़ल में रोल नो है आपके।मैं जान बूझ के नहीं कर रहा था कुछ।

    हाहा।अभी एक महीना ही हुआ है क़रोल बाघ आये। एकाग्रता तो सीख ही रही हूँ अभी।

    सिविल सेवा परीक्षा,त्यागी ज़िंदगी के सबसे महत्वपूर्ण पाठ आसानी से सिखा देती है। आप निश्चिंत रहिए। बस बहते जाइए।

    बहने के लिए नदियों का रुख़ जानना पड़ेगा। मुझसे यहाँ की गालियाँ ही नहीं पढ़ी जाती।

    अरे तो पानी के साथ हो लीजिये। हर एक गली, कोई भी गली आपको आपकी मंज़िल की ही ओर पहुँचायेगी।

    आप परिपक्व लग रहे हैं।कितना वक़्त हो गया यहाँ?

    घड़ी तो मैंने २ साल पहले ही देखना बंद कर दिया था।लास्ट टाइम इंटरव्यू के टाइम ही कलाई घुमायी थी और आँखें सुइयों की तरफ़ पड़ी थी। तबसे उसी वक़्त के इंतज़ार में वक़्त कट रहा है।

    हिन्दी साहित्य ऑप्शनल है ना आपका?

    हाहा नहीं फिजिक्स।

    मुझे डर लग रहा है।मुझसे नहीं होगा।पता नहीं आपसे क्यों बता रही मैं ये। मैं तो आपका नाम तक नहीं जानती।

    अरे। हम सब एक ही दर्द के मारे हैं। अपने नाम से ज़्यादा यहाँ कोचिंग और रैंक से हम सब जाने जाते हैं। और डर लगना तो लाज़मी है।उसके बिना कहाँ ही कुछ संभव हुआ है आज तक।अपने डर को मोनेटाइज़ नहीं होने देना है बस। जितना डर आपको लगेगा,ख़रीदार उतने ही बढ़ते जाएँगे। कोई आपको A B C D लिखना सिखाने लगेगा तो कोई पेपर पढ़ना।आप बस अपना डर ख़ुद सम्भालिये। सब कुछ आपके अंदर ही है। डर,हार,जीत,सफलता,असफलता सब आप ही हैं।

    आपको ऑप्शनल बदलने का सोचना चाहिए वैसे।

    हाहा। अरे इस बार बहुत उम्मीदें हैं। फिजिक्स ही पार लगाएगा।

    समझी।

    अच्छा इतना बोल दिया है तो एक मुफ़्त कि सलाह और मार देता हूँ।

    जी ज़रूर।

    हमेशा पोहे में प्याज़ ऊपर से डलवाइयेगा, चाय ठेले से ही पीजियेगा,बहुत कम लोगों से बात करियेगा और रोज़ अपने अंदर ही अंदर डरियेगा, हर दिन। ये डर ख़त्म नहीं होना चाहिए और किसी को पता नहीं चलना चाहिए।

    धन्यवाद। शायद मुझे इसी की ज़रूरत थी।

    अरे एकदम। एकदम।गुडबाय।

    आपका नाम?

    परसों तक शायद रिजल्ट आ रहा है। आशा करता हूँ उसमें नाम मिल जाये आपको। और अगर नहीं मिला तो यहीं टेस्ट सेंटर पे मिलूँगा।पूछ लीजियेगा।

    दिशा🌻

  • मंथन

    कभी ध्यान से बैठ कर

    दो पल सोच लूँ

    तो लगता है कितना ग़लत कर रही हूँ

    हर काम हर समस्या का हल

    जैसे कोई नितांत हल हो ही ना

    कोई भी समाधान होता ही ना हो

    कोई निस्तारण कोई सुलहनामा

    बना होता ही ना हो

    जैसे मैं रच रही हूँ नयी पहेली

    हर इक समाधान में

    एक चक्रव्यूह में

    ना चाहते हुए

    बस एक हिस्सा एक बड़ा भाग

    मेरे खाते में कुछ समस्याएँ

    जिनकी मैं ख़ुद हूँ

    अंत और शुरुआत!

    दिशा🌻

  • सौदेबाज़ी!

    दुख महंगा बिकता है,

    हम सस्ते तौले जाते हैं।

    मेरी दुविधा मेहंगी बिकती है,

    उपाय सस्ते तौले जाते हैं।

    अधूरा प्रेम बहूमूल्य बिकता है,

    मुकम्मल इश्क़ सस्ता तौला जाता है।

    आवाज़ मेहंगी बिकती है,

    विचार सस्ते तौले जाते हैं।

    फ़ासले महँगे बिकते हैं,

    नज़दीकियाँ सस्ती तौली जाती हैं।

    रास्ते महँगे बिकते हैं,

    घर सस्ते तौले जाते हैं।

    दिशा🌻