मेरी डायरी में इस वक्त इतनी अधूरी कविताएँ हैं, इतने अधूरे लेख हैं, कि मैं अधूरे लेखों पे लिख रही हूँ । बहुत कमाल के लोग होते हैं जो सब अंत तक पहुँचाने का जोश और एकाग्रता रखते हैं।
मुझ जैसे विचलित लेखक से रोज़ रात बिस्तर में कलम ख़ुद दो दफ़े पूछती है, कभी ख़त्म कर पाओगी? कुछ भी? कोई अधूरी लड़ाई, कोई अधूरा सीखा हुआ नृत्य, कोई पुराना याराना, कल वाली वो बात, ऑफिस के काम, अपना श्रृंगार या ये लेख? कुछ भी?
जवाब में मैं अपने बचे सारे होश हवास समेट कर,आधी रात को,कलम को ठेंगा दिखाते हुए जब उठती हूँ, तो मेरा रिकॉर्ड रहा है, कुछ नया अधूरा पनप ज़रूर जाता है ।आज तक कभी कुछ पूरा नहीं हुआ। कलम को खुश करने के चक्कर में डायरी अलग रूठ बातें बनाना शुरू करदेती है, मेरा कुछ तो लाज कर लो! कितने पन्ने खाली पड़े हैं? अब कुछ क्या लिखने की ज़रूरत नहीं है। पहले ये सब पूरा करो ।
क्या पूरा करदू ? बताओ मुझे कोई? मुझे ख़ुद किसी भी शुरुआत का अंत नहीं पता । मुझे ख़ुद किसी कहानी को कैसे ख़तम करना है, नहीं पता । बिल्कुल नहीं पता । खैर मेरा डायरी कलम के साथ रूठना मनाना तो चलता ही रहता है। और बस इसी उम्मीद में कि कभी तो डायरी कलम ख़ुश होकर मुझे कोई खोया एक गुलाब ईनाम में देंगे लिखने का सतत प्रयास करती हूँ पर बदले में मिलता वोही है, एक और अधूरा लेख।
वो आज वर्ल्ड हिस्ट्री की क्लास में आप रह रह के शून्य में देखने लग रही थी ना।जैसे हिटलर को हराने की कोई नयी तरकीब सोच रही हों।
आप मुझे कुछ ज़्यादा ही गौर से नहीं देख रहे हैं?
बग़ल में रोल नो है आपके।मैं जान बूझ के नहीं कर रहा था कुछ।
हाहा।अभी एक महीना ही हुआ है क़रोल बाघ आये। एकाग्रता तो सीख ही रही हूँ अभी।
सिविल सेवा परीक्षा,त्यागी ज़िंदगी के सबसे महत्वपूर्ण पाठ आसानी से सिखा देती है। आप निश्चिंत रहिए। बस बहते जाइए।
बहने के लिए नदियों का रुख़ जानना पड़ेगा। मुझसे यहाँ की गालियाँ ही नहीं पढ़ी जाती।
अरे तो पानी के साथ हो लीजिये। हर एक गली, कोई भी गली आपको आपकी मंज़िल की ही ओर पहुँचायेगी।
आप परिपक्व लग रहे हैं।कितना वक़्त हो गया यहाँ?
घड़ी तो मैंने २ साल पहले ही देखना बंद कर दिया था।लास्ट टाइम इंटरव्यू के टाइम ही कलाई घुमायी थी और आँखें सुइयों की तरफ़ पड़ी थी। तबसे उसी वक़्त के इंतज़ार में वक़्त कट रहा है।
हिन्दी साहित्य ऑप्शनल है ना आपका?
हाहा नहीं फिजिक्स।
मुझे डर लग रहा है।मुझसे नहीं होगा।पता नहीं आपसे क्यों बता रही मैं ये। मैं तो आपका नाम तक नहीं जानती।
अरे। हम सब एक ही दर्द के मारे हैं। अपने नाम से ज़्यादा यहाँ कोचिंग और रैंक से हम सब जाने जाते हैं। और डर लगना तो लाज़मी है।उसके बिना कहाँ ही कुछ संभव हुआ है आज तक।अपने डर को मोनेटाइज़ नहीं होने देना है बस। जितना डर आपको लगेगा,ख़रीदार उतने ही बढ़ते जाएँगे। कोई आपको A B C D लिखना सिखाने लगेगा तो कोई पेपर पढ़ना।आप बस अपना डर ख़ुद सम्भालिये। सब कुछ आपके अंदर ही है। डर,हार,जीत,सफलता,असफलता सब आप ही हैं।
आपको ऑप्शनल बदलने का सोचना चाहिए वैसे।
हाहा। अरे इस बार बहुत उम्मीदें हैं। फिजिक्स ही पार लगाएगा।
समझी।
अच्छा इतना बोल दिया है तो एक मुफ़्त कि सलाह और मार देता हूँ।
जी ज़रूर।
हमेशा पोहे में प्याज़ ऊपर से डलवाइयेगा, चाय ठेले से ही पीजियेगा,बहुत कम लोगों से बात करियेगा और रोज़ अपने अंदर ही अंदर डरियेगा, हर दिन। ये डर ख़त्म नहीं होना चाहिए और किसी को पता नहीं चलना चाहिए।
धन्यवाद। शायद मुझे इसी की ज़रूरत थी।
अरे एकदम। एकदम।गुडबाय।
आपका नाम?
परसों तक शायद रिजल्ट आ रहा है। आशा करता हूँ उसमें नाम मिल जाये आपको। और अगर नहीं मिला तो यहीं टेस्ट सेंटर पे मिलूँगा।पूछ लीजियेगा।